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Veer Savarkar: एक प्रखर राष्ट्रवादी और सच्चा देशभक्त

स्वातंत्र्यवीर, वीर सावरकर: एक प्रखर राष्ट्रवादी और सच्चा देशभक्त

एक देश की सबसे बड़ी जमा-पूंजी उसका इतिहास और संस्कृति होती है लेकिन अगर इसके पीछे ही कुछ लोग हाथ धो कर पड़ जाए तो सोचिये क्या होगा?

भारत भी एक ऐसा ही देश है, जिसके इतिहास को भरपूर दबाने की कोशिश की गयी। हर भारतीय को बचपन से ही यह बताया जाता रहा है कि हमे जीने का सही तरीका मुग़लों ने सिखाया, और उनके जाने के बाद अंग्रेजों की वजह से हम ज़िंदा रहे।

हिंदुस्तान के एजुकेशन सिस्टम में मुग़लों को जितना बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है, शायद ही उतना किसी इस्लामिक देश में उनकी चर्चा होती होगी। हमें बचपन से ही यह सिखा दिया जाता था कि अकबर ‘ग्रेट’ थे, मुगलों ने बड़ी-बड़ी एवं भव्य इमारतें बनवाई जैसे ताज महल, लाल किला, बुलंद दरवाज़ा इत्यादि लेकिन हमें स्कूल में ये बताने वाला कोई नहीं था कि बप्पा रावल कौन थे, राणा सांगा ने किस वीरता से मुग़लों का सामना किया और कैसे छत्रपती शिवाजी महाराज की तलवार से दुश्मन कांप जाया करते थे। भारतीय शिल्पकारों के तो क्या ही कहने, जिन पहाड़ों पर एक व्यक्ति का पैदल चल कर जाना भी बहुत मुश्किल हुआ करता था, उन जगहों पर भी उन्होंने भव्य मंदिरों का निर्माण किया था।

भारत के इतिहास को दबाने की जो प्रथा मुग़लों ने शुरू की उसको अंग्रेज़ो ने आगे बढ़ाया और भारत की आज़ादी के बाद ये ज़िम्मा उस समय की तत्कालीन सरकार ने उठा लिया। हमारे बहुत से वीर स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में झूठी अफवाहें फैलाई गयी। उनकी वीर गाथाओं को इतिहास के पन्नों में दबाने की कोशिश की गयी।

आज के इस ब्लॉग में हम उसी में से एक वीर स्वतंत्रता सेनानी की बात करेंगे जिसको आज भी वो इज़्ज़त और मान-सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वो हकदार थे। भारत के इस वीर स्वतंत्रता सेनानी का नाम विनायक दामोदर सावरकर है।

विनायक दामोदर सावरकर जी को स्वातंत्र्यवीर, वीर सावरकर के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

कौन थे वीर सावरकर (Veer Savarkar)?

वीर सावरकर (Veer Savarkar) एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे और उन्हें हिंदुत्व विचारधारा का जनक भी माना जाता है। यह वही विचारधारा है जिसका पालन आर.एस.एस और बी.जे.पी जैसी संस्थाए करती है।

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई तथा पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर था। विनायक सावरकर के 2 भाई और 1 बहन थी। बड़े भाई का नाम गणेश, छोटे भाई का नाम नारायण और बहन का नाम नैनाबाई सावरकर था। 9 साल की आयु में उनकी माता का देहांत हैजा की बीमारी के कारण हो गया और ठीक 7 वर्ष बाद उनके पिता श्री दामोदर पंत सावरकर भी चल बसे।

वीर सावरकर (Veer Savarkar) की शिक्षा

वीर सावरकर (Veer Savarkar) ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नासिक से की, वह पढाई में बहुत अच्छे थे और उनको ‘हिन्दू’ शब्द से अत्यधिक प्रेम था। अपनी शिक्षा के दौरान उन्होंने बहुत सी कविताएँ भी लिखी थीं।

प्रारंभिक शिक्षा के उपरांत वीर सावरकर (Veer Savarkar) ने उच्च शिक्षा की इच्छा जाहिर की। पिता जी के चले जाने के बाद, बड़े भाई गणेश सावरकर ही घर का खर्चा चलाते थे। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के बाद भी बड़े भाई गणेश ने विनायक सावरकर की उच्च स्तरीय शिक्षा का समर्थन किया।

सावरकर ने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से कला स्नातक स्तर की पढ़ाई की थी, लेकिन सरकार विरोधी गतिविधियों में सक्रिय होने के कारण उनकी डिग्री वापस ले ली गयी थी। कॉलेज के समय से ही सावरकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बुलंद आवाज़ उठाने लगे थे। 1906 में सावरकर ने लंदन जाकर बैरिस्टर बनने की इच्छा जाहिर की। जून 1906 में वह लंदन के लिए निकल गए। सावरकर लंदन जा कर ब्रिटिश सरकार के कार्य करने के तरीके को समझना चाहते थे ताकि वो भारत में आकर आज़ादी की आवाज़ को और बुलंद कर सकें।

वीर सावरकर (Veer Savarkar) द्वारा लिखी गई किताबें

क्रांति के समय में वीर सावरकर (Veer Savarkar) ने बहुत सारी सुप्रसिद्ध किताबें लिखीं। वीर सावरकर ने हिंदुत्व एवं हिन्दू राष्ट्र से लेकर अपने जीवन के संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम के बारे में भी किताबें लिखी। उनकी किताबों को आम जनता से लेकर स्वतंत्रता सेनानी भी पढ़ते थे। उनके लेख के एक-एक अक्षर लोगों में जोश भर दिया करते थे।

वीर सावरकर (Veer Savarkar) की कुछ सुप्रसिद्ध किताबें

  • द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस – 1857
  • हिन्दू राष्ट्र दर्शन
  • काला पानी
  • द ट्रांसपोर्टेशन ऑफ माई लाइफ
  • हिन्दू पद-पादशाही
  • हमारी समस्याएं
  • हिंदुत्व – हू इज हिंदू?

दो बार काला पानी की सज़ा

वीर सावरकर (Veer Savarkar) जब लंदन में थे तब नासिक ज़िले के कलेक्टर एम.टी. जैक्सन की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। उनपर ये इलज़ाम लगाया गया था की जिस पिस्तौल से जैक्सन की हत्या हुई, वह वीर सावरकर (Veer Savarkar) ने लंदन से भेजी थी। इस हत्याकांड के उपरांत वीर सावरकर को अप्रैल, 1911 में काला पानी की सज़ा सुनाई गई।

पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल में जिस प्रकार की यातनाएं दी जाती थी उसे सुनकर किसी की भी रूह कांप उठे। बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों ने सेलुलर जेल में होने वाली ज्‍यादतियों के बारे में बताया है। कहा जाता है कि सेलुलर जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को बैलों की जगह कोल्हू में लगाया जाता था और उनसे तेल निकलवाया जाता था। इतना ही नहीं, आस पास के पहाड़ों और जंगलों को भी समतल करने के लिए जेल में बंद कैदियों का ही प्रयोग किया जाता था और अगर कोई रुक जाए या काम करने से मना कर दे तो उसे कोड़ों से पीटा जाता था।

वीर सावरकर को 2 बार काला पानी की सजा सुनाई गई थी, एक तो कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए और दूसरा ब्रिटिश सरकार का विरोध करने के लिए। यानी उनको अपनी ज़िन्दगी के कुल 50 साल सेलुलर जेल में बिताना था।

जब वीर सावरकर सेलुलर जेल में पहुंचे तो उनसे उनकी सारी किताबें छीन ली गयी थी। वीर सावरकर (Veer Savarkar) को तीसरी मज़िल की एक छोटी सी कोठरी में रखा गया था। इसमें एक पानी का घड़ा और छोटा सा लोहे का गिलास था। सभी कैदियों को बेड़ियों में बांध कर रखा जाता था। ब्रिटिश हुकूमत ने सेलुलर जेल को कुछ इस प्रकार बनाया था ताकि वहां पर हर एक स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अलग कोठरी हो और सूरज की किरणें भी ना पहुँच सकें।

कहा जाता है कि वीर सावरकर (Veer Savarkar) के बड़े भाई गणेश सावरकर को भी इसी जेल में रखा गया था लेकिन इस बात का उन्हें कभी पता ही नहीं चल पाया। सावरकर ने अपनी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण 10 वर्ष काल कोठरी में बिताए थे। अप्रैल 1911 से 1921 तक सावरकर पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल में रहे।

ब्रिटिश हुकूमत से माफीनामा

जेल में रहते हुए वीर सावरकर (Veer Savarkar) को यह समझ में आ गया था कि उनकी पूरी ज़िन्दगी ब्रिटिश सरकार की यातनाए सहते हुए जेल की चार दिवारी के अन्दर ही कट जाएगी। वह कभी भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय नहीं हो पाएंगे। यह बात ध्यान में रखते हुए वीर सावरकर (Veer Savarkar) ने रणनीतिक रूप से अंग्रेजी हुकूमत को 6 बार माफीनामा भेजा। सेलुलर जेल में रह रहे कैदियों के अच्छे बर्ताव पर उनकी सज़ा कम कर दी जाती थी इसी का फायदा उठाते हुए वीर सावरकर ने अपने व्यवहार में परिवर्तन लाया। वह ब्रिटिश हुकूमत की हर बात मानने लगे थे और समय समय पर रणनीति के अनुसार माफीनामा लिख दिया करते थे। 1924 में अंग्रेजी हुकूमत ने उनके माफीनामे को क़ुबूल कर उन्हें रिहा कर दिया था।

लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक की दया याचिका

वीर सावरकर (Veer Savarkar) के माफीनामे की मुखबिरी 1920 में वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक ने की थी। वल्लभ भाई और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश सरकार ने वीर सावरकर की रिहाई पर मुहर लगाई थी। वीर सावरकर (Veer Savarkar) यह बात जानते थे कि वह जेल में रह कर भारत की स्वतंत्रता में अपना योगदान नहीं दे पाएंगे इसलिए उन्होंने जेल से बाहर आकर भूमिगत तरीके से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।

सावरकर के नाम के आगे वीर लगाने का कारण

अगर भारत के बुद्धिजीवियों की माने तो विनायक दामोदर सावरकर जी ने खुद को स्वातंत्र्यवीर, वीर सावरकर (Veer Savarkar) के नाम से सम्बोधित किया था लेकिन यह सच नहीं है।

अगस्त 15, 1924 को श्री सदाशिव राजाराम रानाडे ने विनायक सावरकर जी की जीवनी लिखी थी। उस किताब के हर एक पन्ने पर सावरकर जी को स्वातंत्र्यवीर कह कर सम्बोधित किया गया था।

इतना हीं नहीं, गांधी जी और भगत सिंह जी जैसे वीर स्वतंत्रता सेनानी भी वीर सावरकर (Veer Savarkar) के जीवन से बहुत प्रभावित थे, वे दोनों भी उन्हें वीर मानते थे।

प्रख्यात लोगों की वीर सावरकर (Veer Savarkar) के बारे में राय

अटल जी भी थे वीर सावरकर के प्रशंसक-

अपने एक भाषण में अटल जी ने वीर सावरकर को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया था, ‘सावरकर एक व्यक्ति नहीं हैं, एक विचार हैं। वो एक चिंगारी नहीं हैं, एक अंगार हैं। वो सीमित नहीं हैं, एक विस्तार हैं।’

महात्मा गांधी भी वीर सावरकर के कायल थे-

महात्मा गांधी ने अपने एक पत्र में लिखा था, “अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा, तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र (विनायक दामोदर सावरकर और गणेश सावरकर) सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे. एक सावरकर भाई (वीर सावरकर) को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला है। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं हैं. मौजूदा शासन-प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं।”

इंदिरा गांधी भी करती थी वीर सावरकर का सम्मान

इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में वीर सावरकर के सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। साथ ही उन्होंने सावरकर ट्रस्ट में 11 हजार रुपए भी दान किये थे।

स्वतांत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के सचिव पंडित बाखले ने इंदिरा जी को एक पत्र लिख कर वीर सावरकर की 100वीं जयंती मनाने का प्रस्ताव भेजा था जिसके उपरांत 20 मई 1980 को इंदिरा गांधी ने पंडित बाखले को लिखा था, ‘मुझे आपका 8 मई 1980 को भेजा पत्र मिला। वीर सावरकर का अंग्रेजी हुक्मरानों का खुलेआम विरोध करना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक अलग और अहम स्थान रखता है। मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें और भारत माता के इस महान सपूत की 100वीं जयंती के उत्सव को योजना अनुसार पूरी भव्यता के साथ मनाएं।’

पहले क्रन्तिकारी जिन पर भारत सरकार ने मुकदमा चलाया

गांधी जी की हत्या के आरोप में भारत सरकार ने वीर सावरकर (Veer Savarkar) के भी ऊपर मुकदमा चलाया था लेकिन यह आरोप सिद्ध ना हो सका। इसी प्रकार वीर सावरकर पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी बन गये जिनके ऊपर आज़ाद भारत की सरकर ने मुकदमा चलाया। हालांकि निर्दोष साबित होने के बाद भारत सरकार ने वीर सावरकर से माफ़ी भी मांगी लेकिन वीर सावरकर इस बात से बहुत हताश थे।

1964 में वीर सावरकर (Veer Savarkar) ने समाधि लेने की इच्छा ज़ाहिर की, उनका मानना था कि भारत को अब पूर्ण रूप से आज़ादी मिल गयी है। आज़ादी के 19 साल बाद फ़रवरी 26, 1966 को वीर सावरकर का निधन हुआ। उन्होंने फ़रवरी 1, 1966 को आमरण उपवास रखने का फैसला किया था इसी कारणवश उनकी मृत्यु हो गयी।

जवाहरलाल नेहरू ने भी मांगी थी माफ़ी

जिन माफीनामों को आधार बनाकर हमारे भारत के बुद्धिजीवी और वामपंथी, वीर सावरकर को देशद्रोही करार देने की कोशिश करते है वह लोग यह भूल जाते है की उनके प्रिय नेता नेहरू ने भी अंग्रेजो से माफ़ी मांगी थी।

साल 1923 में नाभा रियासत में गैर कानूनी तरीके से प्रवेश करने के कारण ब्रिटिश सरकार ने जवाहरलाल नेहरू को 2 साल की सजा सुनाई थी। उस सज़ा से बचने के लिए नेहरू ने ब्रिटिश सरकार को माफ़ीनामा दिया था। जवाहरलाल नेहरू को जेल से रिहा करने की सिफ़ारिश लिए उनके पिता मोतीलाल नेहरू उस समय के तत्कालीन वाइसरॉय के पास पहुंचे थे। नेहरू ने कभी भी नाभा रियासत में कदम ना रखने की कसम खाते हुए अपनी सजा को माफ़ करवा लिया था और वह सिर्फ 2 हफ्ते में ही जेल से बाहर आ गए थे।

सोचने वाली बात यह है की जहाँ कुछ प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी जेल में रह कर मोटी-मोटी इतिहास कि किताबें लिख दिया करते थे और अपने घर ख़त भेज दिया करते थे, वहीं पर कुछ ऐसे भी थे जिन्हें जेल के अंदर लिखना तो दूर, सूरज की किरणें भी देखने को नहीं मिलती थीं।

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